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prashant choubey


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रशांत जी , आपने अपने लेख में जो विचार व्यक्त किये हैं उनके बारे में मैं यही कहना चाहूँगी कि सपा हो या कोई अन्य पार्टी वह बेवकूफ जनता का भरपूर फायदा उठाती है । इस मामले में जनता ही उस भैस के समान है जिसके सामने कितना भी बीन बजालो उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता । सपा लेपटॉप देकर सिर्फ अपने लिए वोट बटोरने में लगी है उसे यूपी के स्कूलओं की दशा नजर नहीं आती या यूपी बोर्ड की कमियाँ नजर नहीं आतीं । बातें बहुत बड़ी बड़ी करते हैं पर जहाँ जिस चीज की कमी होती है वहाँ उसे कमी नजर नहीं आती । बात मैट्रो रेलवे की कर रहे हैं पर यूपी के सडकों की दशा देखो । मुझे पता नहीं ये अखिलेश यादव अख़बार पढ़ते भी हैं या नहीं । सराहनीय प्रयास आपने एक बार पूछा था कि क्या मैं फेस बुक पर हूँ जी हाँ मैं फेस बुक पर हूँ ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

आदरणीय चौबे जी , आपका कमेन्ट मैंने अपने ब्लॉग में पढ़ा । मैं आपकी सारी बातों से सहमत हूँ पर मुझे एक बात बताइए अपने आपको नमकीन बटर कहने वाली कौन है ? विज्ञापन को आकर्षित बनाने वाली कौन है ? अपने आपको झंडू बाम कहलाने वाली कौन है ? ये सब पैसे के लिए किया जाता है और आजकल सब पर पैसे का नशा हावी है । मुझे आज भी याद है एक बार इंडिया टी वी पर ''आपकी अदालत में बाबा रामदेव और मालविका का इंटरव्यू आ रहा था , जब मालविका ने उसमें बड़े ही शान से कहा कि मेरा शरीर है मैं उसे चाहे उघाडू या ढकूं किसी को क्या फर्क पड़ता है , हम तो वही दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है । अब आप इसके बारे में क्या कहेगें ? अब मीडिया या सिनेमा वालों ने तो उनके साथ ये विज्ञापन जबरन नहीं कराए जब नारी ही आसमान में उड़ने लगे तब कुछ भी कहिए आज नारी को एक मर्यादा में रहना ही old of fashion लगता है वही बड़े शान से कहती है कि सारे बंधन हम पर ही क्यों ,सिर्फ हम ही क्यों ढककर क्यों रहें ? प्रशांत जी हमारे बुजुर्ग कहा करते थे औरत और मर्द का रिश्ता आग और घी का होता है । जब बुजुर्गों की बातें हम हवा में उड़ाने लगें तो ये सब समस्याएं तो हमारे समाज में पैदा होऐगी ही । कहने के लिए बहुत कुछ है सिर्फ मीडिया या नेताओं को दोषी ठहराने से काम नहीं चलेगा जरूरत है तो हमें फिर से बुजुर्गों की बातों पर अमल करने की । तभी हमारे समाज में सुधार आएगा । एक बात और प्रशांत जी मैं पुराने विचारों की नहीं हूँ पर एक बात हर नारी से कहना चाहूँगी कि हम चाहे किसी भी सदी में जियें पर यह ना भूलें कि लज्जा ही नारी का गहना है

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

धन्यवादबहन जी। मैं आपका पोस्ट पढ़ूगा सुषमा जी मैंने मीडिया द्वारा दिखाये जा रहे, विज्ञापनों पर बात की । अब बताइये क्या सेन्ट लगाने से लड़कियाँ पटती है। गैंग आफ वासेपुर में गाली की भरमार थी। पर मीडिया ने उसका खुब प्रचार किया। क्यों। क्या उस फिल्म को ए सार्टिफिकेट देने से वह फिल्म साफसुथरी हो गयी। क्या किसी न्यूज चैनल ने इसका विरोध जताया। क्या लड़कियाँ नमकीन बटर है जो उनको कौई खा लेगा। पर इसी गाने को मीडिया हिट बनाने में जुट गयी। क्या बोल्ड वोही है जो अपने कपड़े उतारे । क्या लड़कियों को भोग की वस्तु दिखाना जरूरी है। क्या मीडिया इनका बहिष्कार नहीं कर सकता।  बाते और भी है जो मैं अपने अगले पोस्ट मीडिया भी है रेप की जिम्मेदार में लिखूँगा।  और जब कोई लड़का किसी लड़की को लेकर भागता है तब हम इसका समर्थन करते है। परन्तु हमें यह भी ध्यान देना होगा कि वह किसी की घर की इज्जत को लेकर भागा है। हमें लड़को के इस कृत्य पर उन्हें थप्पड़ मारना होगा। क्योकि जब हमार लड़का किसी लड़की को लेकर भागता है तो हम उसका साथ देते है और लड़की को मारते है। तो हमें लड़को को सबक सिखाना होगा।

के द्वारा: prashant choubey prashant choubey

प्रशांत जी की बातों से कुछ हद तक मैं सहमत हूँ पर एक बात मुझे समझमें नहीं आई वो यह कि आप मिडिया को कौन से संस्कार युक्त महान जीवनी से सम्बन्धित प्रोग्राम दिखाने की बात कर रहे हैं । मिडिया तो हर तरह के प्रोग्राम दिखाता है वह तो हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम क्या देखना पसंद करते हैं ? एक बात और आजकल जितनी भी वीभत्स घटनाएँ हो रही हैं वे भी ग्रामीण युवकों के द्वारा की जा रही हैं जहाँ धार्मिक प्रवर्ति के लोग ज्यादा रहते हैं और जिनके परिवार में हर नवरात्रों में कन्या पूजन किया जाता है फिर उनकी आत्मा देवियों के साथ इतनी घिनौनी हरकत करने की इजाजत कैसे देती है ? लिखने के लिए बहुत कुछ है । इन सब का हल क्या है ? कैसे होगा इन घिनौनी हरकतों का अंत तो इसको जानने के लिए मेरा लेख '' औपचारिक होती भारतीय हिन्दू परम्पराएँ " जरुर पढ़ें ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav




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